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बुधवार, 18 जनवरी 2017

बंकर बस्ती - निदा नवाज़ की कविता

निदा नवाज़ हमारे लिए कश्मीर की आँख भी हैं और ज़बान भी. ख़बरों की भीड़ में कश्मीर का सच उनके यहाँ से मिलता है हमें. उनकी कविताएँ युद्ध भूमि के बीच बैठकर लिखी कविताएँ हैं...पागलपन के दौर में एक रौशनख़याल कवि के क़लम से बनी सच की तस्वीर...असुविधा आभारी है निदा भाई का कि उन्होंने इन कविताओं को आप तक पहुँचाने के लिए हमें चुना 



बंकर बस्ती  


(1)

आँखों में आँखें डाल कर
फुंकारता है डर

बंकर के चारों तरफ़ बिछी
रेज़र-वायर के नुकीले ब्लेड
जैसे ढल जाते हैं
साँपों के हज़ारों विष दन्तों में

बेसाख़्ता तेज़ हो जाती हैं
दिल की बेतरतीब-धड़कनें
बंकर के अंदर से
बन्दूकों के ट्रिगर्स पर
उँगलियों का दबाव बढ़ने लगता है
भूखी आँखों के चन्द जोड़े
एक थरथराते देह पर
साधने लगते हैं अचूक-निशाना

इस बंकर-बस्ती के नुक्कड़ पर
हर दिन मर जाता है कोई
अल्हड़ बालक परिंदा
एक बेनाम-मौत।

(2)

शाम होते ही हर तरफ़ फैल जाता है
सियाह-सहमा-सन्नाटा

लोग ढ़ल जाते हैं लाशों में
सूरज डर के मारे सिकुड़ जाता है
एक बड़े से रक्त-धब्बे में
नीड़ों में सिमट चुके परिंदे
मुश्किल से सुन पाते हैं
बंकर  बस्ती की धीमी-धड़कनें
अज़ानोँ और चिमनियों से निकलता
हरा-काला धुंआ
घेर लेता है सारी फ़ज़ा को

किसी बंकर  से निकली
रम और विस्की की ताज़ी बू
ऊँची मीनारों का चिड़ा रही है मुंह
चंद बिखरी परछाइयाँ
सुरमई साँझ की उखड़ी सांसों पर
लिख कर चली जाती हैं
इतिहास के निर्दय-अक्षरों में
अपनी पहचान खो चुके
एक सुंदर शहर की
आख़िरी वसीयत।

(3)

सब कुछ तैयार है
बौने मीडियाकर्मी बुलाये जा चुके हैं
कैमरों की आँखों तन गईं हैं
बंकर-चौक पर
एक क्लेंशिकोफ़ और चन्द हथगोले भी
हथियार-ग्रह से मंगाये गए हैं
प्रेस-नोटों में केवल नाम-मात्र भरना बाक़ी है
प्रतीक्षा है बस एक नये निशाने की

बग़ल में फाइलें दबाये
निकलेगा ही कोई बाबू दफ़्तर के लिए
किसी छात्र को
स्कूल जाने की जल्दी तो होगी
हस्पताल जाने की टोह में
कोई बीमार तो चाहता होगा दर्द से बचना
अपने बच्चों की स्कूली फ़ीस
जुटाने की मस्ती में
मज़दूर तो कोई निकलेगा ही अपने घर से
और कल परोसी जाएगी समाचार-पत्रों में
टीवी-चनलों के प्राइम-टाइम पर
बड़ी बेबाकी से यह ख़बर

"कल बंकर -बस्ती के चौक में
सुरक्षा कर्मियों के साथ हुई मुठभेड़ में
एक खूंखार आतंकी मारा गया"

(4)

बंकर  बस्ती के उस किनारे
स्कूल के आंगन में फैली
बच्चों की बेजान पंक्तियां
किसी पालीथीन के एल्बम में
सजाई गई हों तितलियां
या जैसे छोटे-छोटे रोबोज़ को
कभी न मुस्कुराने
और न ही
कभी ख़ुश रहने के लिए
प्रोग्राम किया गया हो

युध्दक्षेत्र बने मेरे इस शहर का
बेजान मुरझाया हुआ यह भविष्य
अपने नाज़ुक कांधों पर
अतीत और वर्तमान का
क्रूर बोझ उठाये
एक लक्ष्यहीन सड़क पर
दिन-रात रेंग रहा है।

(5)

बंकर  बस्ती की एक अँधेरी गली में
चेहरे पर काला नक़ाब चढाये
एक साया
धो रहा है ख़ून से सने अपने हाथ
और थोड़ी ही दूरी पर
किसी निर्दोष के जीवन-पन्नों पर
रक्तिम-छींटों से लिखी जा चुकी है
एक आख़री लाल इबारत।

(6)

फ़तवों की फ़सल काटते-काटते
उन्हें केवल मिलते हैं
आंसुओं के उपहार
पत्थरबाज़ी की बेगार
और हर तरफ़ की मार
बीच बंकर -बस्ती के
चौराहे पर

(7)

रहस्य भरी ख़ामोशी में ढलती
इस बंकर  बस्ती की
ये रंग-ब-रंगी घर-नुमा क़ब्रें
चंद लाख जाने पहचाने
कंकालों को समेटे
और इन्ही की ओट में
बेनाम क़ब्रों के विशाल स्पॉट मैदान

फास्फोरस मिट्टी के एक एक कुण्ड में
हज़ारों लोगों की निर्मम हत्याओं के षड्यंत्र की अनकही दास्तानें दफ़नाए
ये फास्फोरस गन्ध बिखेरती क़ब्रें
इतिहास के कठघरे में खड़ा होकर
ज़रूर एक दिन करेंगीं
एक एक हत्या का खुलासा

(8)

नन्हे हाथों की नाज़ुक पकड़ में
पत्थर संम्भालते चंद बच्चे
बंकर  बस्ती की दहलीज़ पर खड़े
नई सुबहह को तलाश रहे हैं
फूल-चेहरों वाले कुछ और बच्चे
ज़हरीले छर्रों की लपेट में आ गये हैं
और उनकी आँखों के सामने

फैल गई है
एक क्रूर काले अँधेरे की
अजगर-रात।

(9)

यौवन के कंधों पर
मस्ती से चलती
पीले-सुरमई लाल रंग की
एक नाज़ुक तितली का सफ़ेद फ्राक
बंकर-बस्ती के कंटीले तारों में फंस गया
देह के साथ साथ आत्मा भी
रक्त-रक्त हुईं
उसके सपनों की


जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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