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रविवार, 4 नवंबर 2012

आनंद कुमार द्विवेदी की ग़ज़लें


आनंद कुमार द्विवेदी को मैंने फेसबुक से ही जाना. दिल्ली में एक बहुत छोटी, लेकिन आत्मीय मुलाक़ात के अलावा उनसे मेरा सम्पर्क नेट से ही है. बीच-बीच में उनके कुछ शेर यहाँ-वहाँ देखे और ग़ज़ल के व्याकरण से अपने नितांत अपरिचय के बावजूद उनसे बहुत प्रभावित हुआ. उनके यहाँ सिर्फ 'ग़म-ए-जाना' ही नहीं बल्कि ग़म-ए-दौराँ भी है, वह भी एक बेहद सादा लेकिन मानीखेज़ कहन के साथ...असुविधा पर उनका स्वागत 



एक 

दो चार रोज ही तो मैं तेरे शहर का था
वरना तमाम उम्र तो मैं भी सफ़र का था

जब भी मिला कोई न कोई चोट दे गया
बंदा वो यकीनन बड़े पक्के जिगर का था

हमने भी आज तक उसे भरने नहीं दिया
रिश्ता हमारा आपका बस ज़ख्म भर का था

तेरे उसूलतेरे  फैसले ,   तेरा  निजाम
मैं किससे उज्र करता, कौन मेरे घर का था

जन्नत में भी कहाँ सुकून मिल सका मुझे
ओहदे पे वहाँ भी  कोई तेरे असर का था

मंजिल पे पहुँचने की तुझे लाख दुआएं
‘आनंद’  बस पड़ाव तेरी रहगुज़र का था



 (दो)

आ जिंदगी तू आज मेरा कर हिसाब कर
या हर जबाब दे मुझे  या लाजबाब कर 

मैं  इश्क  करूंगा  हज़ार  बार करूंगा
तू जितना कर सके मेरा खाना खराब कर

या छीन  ले नज़र कि कोई ख्वाब न पालूं
या एक काम कर कि मेरा सच ये ख्वाब कर

या मयकशी से मेरा कोई वास्ता न रख
या ऐसा नशा दे कि मुझे ही शराब कर 

जा चाँद से कह दे कि मेरी छत से न गुजरे
या फिर उसे मेरी नज़र का माहताब कर

क्या जख्म था ये चाक जिगर कैसे बच गया  
कर वक़्त की कटार पर तू और आब कर

खारों पे ही खिला किये है गुल, ये सच है तो
‘आनंद’ के  लिए  भी  कोई तो गुलाब कर 


(तीन )


मुश्किल से, जरा देर को सोती हैं लड़कियां,
जब भी किसी के प्यार में होती हैं लड़कियां

पापा को कोई रंज न हो, बस ये सोंचकर
अपनी हयात ग़म में  डुबोती हैं लड़कियां 

फूलों की तरह खुशबू बिखेरें सुबह से शाम
किस्मत भी गुलों सी लिए होती हैं लड़कियां

उनमें...किसी मशीन में, इतना ही फर्क है,
सूने  में  बड़े  जोर  सेरोती   हैं   लड़कियां

टुकड़ों में बांटकर कभीखुद को निहारिये
फिर कहिये, किसी की नही होती हैं लड़कियां

फूलों का हार हो  कभी  बाँहों का हार हो
धागे की जगह खुद को पिरोती हैं लड़कियां

‘आनंद’ अगर अपने तजुर्बे  कि   कहे तो
फौलाद हैंफौलाद ही होती हैं लड़कियां 



 (चार )


इस नाज़ुक़ी से मुझको  मिटाने का शुक्रिया
क़तरे को  समंदर से  मिलाने  का शुक्रिया  

मेरे सुखन को अपनी महक़ से नवाज़ कर
यूँ आशिक़ी का  फ़र्ज़  निभाने का शुक्रिया 

रह रह  के तेरी खुशबू उमर भर  बनी रही
लोबान  की  तरह से   जलाने का शुक्रिया  

इक भूल  कह  के  भूल ही जाना कमाल है
दस्तूर-ए-हुश्न   खूब  निभाने   का  शुक्रिया

आहों  में  कोई और हो   राहों  में कोई और
ये साथ  है   तो  साथ में  आने  का शुक्रिया 

दुनिया  भी बाज़-वक्त   बड़े  काम की लगी
फ़ुरसत में  आज  सारे ज़माने  का शुक्रिया

जितने थे  कमासुत  सभी शहरों में  आ गए 
इस  मुल्क  को ‘गावों का’ बताने का शुक्रिया 

ना प्यार  न सितम  न  सवालात  न झगड़े 
‘आनंद’   उन्हें  याद   न  आने  का शुक्रिया 

 (पाँच )

 भूख लाचारी नहीं तो और क्या है दोस्तों
जंग ये जारी नहीं तो और क्या है दोस्तों

अब कोई मज़लूम न हो हक़ बराबर का मिले
ख़्वाब  सरकारी  नहीं तो और क्या है दोस्तों

चल रहे भाषण महज औरत वहीं की है वहीं 
सिर्फ़ मक्कारी नहीं तो  और क्या है दोस्तों

अमन भी हो प्रेम भी हो जिंदगी खुशहाल हो
राग दरबारी नहीं  तो  और क्या  है दोस्तों

नदी नाले  कुँए  सूखे,  गाँव  के  धंधे  मरे
अब मेरी बारी नहीं तो  और क्या है दोस्तों

इश्क मिट्टी का भुलाकर हम शहर में आ गए
जिंदगी प्यारी नहीं तों और क्या है दोस्तों



(छह ) 

न ही कोई  दरख़्त  हूँ  न  सायबान हूँ
बस्ती से जरा दूर का तनहा  मकान हूँ

चाहे जिधर से देखिये बदशक्ल लगूंगा
मैं जिंदगी की चोट का ताज़ा निशान हूँ

कैसे कहूं कि मेरा तवक्को करो जनाब
मैं खुद किसी गवाह का पलटा बयान हूँ

आँखों के सामने ही मेरा क़त्ल हो गया
मुझको यकीन था मैं बड़ा सावधान हूँ

तेरी नसीहतों का असर है या खौफ है
मुंह में  जुबान भी हैमगर बेजुबान हूँ

बोई फसल ख़ुशी की ग़म कैसे लहलहाए
या तू खुदा है, या मैं अनाड़ी किसान हूँ

एक बार आके देख तो ‘आनंद’ का हुनर
लाचार परिंदों काहसीं आसमान हूँ  !!

16 comments:

वन्दना ने कहा…

आनन्द जी की तो बात ही निराली है :)

Anand Dwivedi ने कहा…

यात्रा के इस आरंभिक चरण में असुविधा का साथ महत्वपूर्ण है | कृतज्ञता |

Meenakshi Mishra Tiwari ने कहा…

Arrey waah!!

hridyanubhuti ने कहा…

आनंद जी की ग़ज़लें बेहद सरल और सहज होती हैं,सीधे ह्रदय में उतरती हैं . सदा यूँ ही लिखते रहें,आगे बढ़ते रहें अपनी रचना कलम से हर शब्द भावों से सजाते रहें यही कामना है।
अनंत शुभकामनाओं के साथ ....

सादर

hridyanubhuti ने कहा…

आनंद जी की ग़ज़लें बेहद सरल और सहज होती हैं,सीधे ह्रदय में उतरती हैं . सदा यूँ ही लिखते रहें,आगे बढ़ते रहें अपनी रचना कलम से हर शब्द भावों से सजाते रहें यही कामना है।
अनंत शुभकामनाओं के साथ ....

सादर

expression ने कहा…

आनंद जी को नियमित रूप से पढ़ती हूँ...कमाल की लेखनी है उनके पास....
बधाई...

अनु

Bharat Tiwari ने कहा…

आनंद जी ... उम्दा ग़ज़लें ... उम्दा इंसान
दिल से मुबारकबाद
सादर
भरत

Asha Kant ने कहा…

Gazab!!!! Anandji...aapki gazalon ke hum to fan ho gaye..

Adv. ekhlaque amad ने कहा…

anand bhai , aaj aap ke in gazlon ko parha dil ko ek ehsaas hua ki sach main aap jaise log hain is bhasa ki sewa main jo chupe hue hain, bhagwan kare aap aur age barhen , aur ye asuvidha aap ke aage barhne main suviddha ban ker aaye

Riya ने कहा…

nisandeh ..... anand ji bahut hi saral sabdo me dil ko chhune wali kavitayen aur gazlen likhte hain .... asuvidha hi nahi hum bhi bahut prawahit hain ....aaj tak aisa kabhi nahi hua ki unka lika dil tak na utra ho..... subhkamnayen anand ji

Riya ने कहा…

nisandeh ..... anand ji bahut hi saral sabdo me dil ko chhune wali kavitayen aur gazlen likhte hain .... asuvidha hi nahi hum bhi bahut prawahit hain ....aaj tak aisa kabhi nahi hua ki unka lika dil tak na utra ho..... subhkamnayen anand ji

Pranjal Dhar ने कहा…

आनंद की गजलें पढ़कर इस बात के एहसास होता है कि गजल महज़ हुस्न-इश्क की बातचीत भर नहीं है... बल्कि यहाँ दुनिया जहान की समस्याएँ भी आती हैं...बेहद व्यापक धरातल वाली गजलें॥मेरी बधाइयाँ...प्रांजल धर

कृष्ण नन्दन मौर्य ने कहा…

आँखों के सामने ही मेरा क़त्ल हो गया
मुझको यकीन था मैं बड़ा सावधान हूँ

...वाह क्या बात है

वीनस केसरी ने कहा…

सुन्दर भावाभिव्यक्ति
बेहतरीन कहन

एक गह्ज़ल में एक से अधिक बहर का प्रयोग अनुचित लगा

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

दुनिया भी बाज़-वक्त बड़े काम की लगी
फ़ुरसत में आज सारे ज़माने का शुक्रिया

बहुत ही उम्दा गजलें हैं बेहद साफगोई और आसां कहन के साथ बड़े मारक शेर कहे हैं .....बधाई और शुक्रिया !

Kulbhushan Mishra ने कहा…

हकीकत और अफसानों को बयान करतीं गज़ले हैं, वाह आनंद साहब वाह

जिन्होंने सुविधा नहीं असुविधा चुनी!

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