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मंगलवार, 28 मई 2013

'फुर्सत में आज' : आनंद कुमार द्विवेदी का पहला ग़ज़ल संग्रह


आनंद कुमार द्विवेदी बड़ी सादगी से लगातार ग़ज़लें कहते रहते हैं. उनके अशआर और उनकी कहन में एक ताज़गी भी है और जदीदी शायरी की रवायत का एक साफ़ असर भी. किताब बोधि प्रकाशन से आई है और क़ीमत है 70/- रुपये. असुविधा की ओर से इस किताब का एहतराम और यह उम्मीद कि किताब ग़ज़ल के कद्रदानों द्वारा पसंद की जायेगी. 




मुझे होशियार लोगों  को कभी ढ़ोना नहीं आया
कि ज़ालिम  की तरह बेशर्म भी होना नहीं आया
|

मैं यूँ ही घूमता था नाज़ से, उसकी मोहब्बत पर ,
मेरे हिस्से में उसके दिल का इक कोना नहीं आया |

अगर सुनते न वो हालात मेरेकितना अच्छा था
ज़माने भर का गम था पर  उसे रोना नहीं आया |

खुदा  को भी बहुत ऐतराज़,  है मेरे उसूलों पर,
वो  जैसा चाहता है  मुझसे वो होना नहीं आया |

नहीं हासिल हुई रौनक , तो उसकी कुछ वजह ये है 
बहुत पाने की चाहत थी मगर  खोना नहीं आया  |

मैं अक्सर खिलखिलाता हूँ, मगर ये रंज अब भी है,
मुझे  'आनंद' होना था ...मगर होना  नहीं  आया  |


 (2) 



अपने स्कूलों  से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
जिंदगी जब भी मिली
, उसने सिखाया और कुछ!

सख्त असमंजश में हूँ बच्चों को क्या तालीम दूँ  ,
साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !

आज फिर मायूस होकर, उसकी महफ़िल से उठा,
मुझको मेरी बेबसी ने ,   फिर रुलाया और कुछ  !

इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
मैंने पूछा और कुछ,   उसने बताया और कुछ  !

सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
मुझको वादे कुछ मिले थे,   मैंने पाया और कुछ !

आजकल 'आनंद' के,    नग्मों की रंगत और है ,
शायद उसका दिल किसी ने फिर दुखाया और कुछ


 (3)

 इतना भी गुनहगार न मुझको बनाइये
सज़दे के वक़्त यूँ न मुझे  याद आइये

नज़रें नहीं मिला रहा हूँ अब किसी से मैं
ताक़ीद कर गए हैं वो, कि, ग़म छुपाइये

मतलब निकालते हैं लोग जाने क्या से क्या
आँखें छलक रहीं हो अगर मुस्कराइये

वो शख्स मुहब्बत के राज़ साथ ले गया
अब लौटकर न आयेगागंगा नहाइये

सदियों का थका हारा था दामन में रूह के
'आनंद' सो गया है, उसे मत जगाइये 


(4)

मेरी राम कहानी लिख
ये बेबाक बयानी लिख

मरघट जैसी चहल-पहल
इसको मेरी जवानी लिख

मेरे आँसू झूठे लिख
मेरे खून को पानी लिख

मेरे हिस्से के ग़म को
मेरी ही नादानी लिख

मेरी हर मज़बूरी को
तू मेरी मनमानी लिख

ऊँघ रहे हैं लोग, मगर
मौसम को तूफानी लिख

मेरे थके क़दम मत लिख
शाम बड़ी मस्तानी लिख

ज़िक्र गुनाहों का मत कर
वक़्त की कारस्तानी लिख

दिल से दिल के रिश्ते लिख
बाकी सब बेमानी लिख

जब भी उसका जिक्र चले
दुनिया आनी-जानी लिख

लिखना हो 'आनंद' अगर
बिधना की शैतानी लिख


(5)

क्या तमाशे कर रहा है आदमी
अब नज़र से गिर रहा है आदमी 

बिन लड़े जीना अगर संभव नहीं
बिन लड़े क्यों मर रहा है आदमी 

हर जगह से हारकर, सारे सितम 
औरतों पर कर रहा है आदमी 

देश की नदियाँ सुखाकर, फ़ख्र से 
बोतलों  को  भर रहा है आदमी
  
हाथ में लेकर खिलौने एटमी  
आदमी से डर रहा है आदमी 

योग, पूजा, ध्यान नाटक है, अगर  
भूख से ही लड़ रहा है आदमी 

है पड़ी स्विच-ऑफ दुनिया जेब में 
ये तरक्की कर रहा है आदमी  



(6) 

 मंज़िल  के  बाद  कौन  सफ़र  ढूंढ  रहा हूँ
अपने  से  दूर  तुझको  किधर  ढूंढ  रहा हूँ

कहने को शहर छोड़कर सहरा में आ गया
पर   एक    छाँवदार  शज़र  ढूंढ  रहा   हूँ

जिसकी नज़र के सामने दुनिया फ़िजूल थी
हर शै  में  वही  एक  नज़र  ढूंढ  रहा  हूँ

लाचारियों का हाल तो देखो कि इन दिनों
मैं दुश्मनों  में  अपनी  गुजर  ढूंढ  रहा  हूँ

तालीम  हमने पैसे  कमाने  की दी  उन्हें
नाहक  नयी  पीढ़ी  में  ग़दर  ढूंढ  रहा हूँ

जैसे शहर में  ढूंढें  कोई  गाँव वाला  घर
मैं मुल्क  में  गाँधी का असर ढूंढ रहा हूँ

यूँ गुम हुआ कि सारे जहाँ में नहीं मिला
'आनंद' को  मैं  शामो-सहर  ढूंढ रहा हूँ



 (7)

  
बैठा हुआ सूरज की अगन देख रहा हूँ
गोया तेरे जाने का सपन देख रहा हूँ

मेरी वजह से आपके चेहरे पे खिंची थी
मैं आजतक वो एक शिकन देख रहा हूँ

सदियों के जुल्मो-सब्र नुमाया है आप में
मत सोचिये मैं सिर्फ़ बदन देख रहा हूँ

दिखती कहाँ हैं आँख से तारों की दूरियाँ
ये कैसी आस है कि  गगन देख रहा हूँ

रंगों से मेरा बैर कहाँ ले चला मुझे
चूनर के रंग का ही कफ़न देख रहा हूँ

जुमले तमाम झूठ किये एक शख्स  ने
पत्थर के पिघलने का कथन देख रहा हूँ

'आनंद' इस तरह का नहीं, और काम में
जलने का मज़ा और जलन देख रहा हूँ


15 comments:

आनंद कुमार द्विवेदी ने कहा…

क्या कहूं अशोक भाई किताब को लोकार्पित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , इन उम्मीदों पर खरा उतरूं यही दुआ कीजिये

आज से हर ज़ख्म दुनिया की नज़र हो जायेगा
आपका बंदा ग़ज़ल का हमसफ़र हो जायेगा

ठोकरों पर ठोकरें फिर ज़ख्म उस पर बेरुख़ी
क्या ख़बर थी एक दिन ऐसा असर हो जायेगा

sarita sharma ने कहा…

चतुर समय में सीधी सादी दिल को छूने वाली गजलें.प्रेम की नाकामी को सहज भाव से स्वीकार कर लिया गया है.'आह से निकला होगा गान'- इन गजलों का मूल स्वर है.ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति का पत्थरदिल शहर में अजनबीपन झलकता है.

प्रदीप कांत ने कहा…

मैं यूँ ही घूमता था नाज़ से, उसकी मोहब्बत पर ,
मेरे हिस्से में उसके दिल का इक कोना नहीं आया |

अगर सुनते न वो हालात मेरे, कितना अच्छा था
ज़माने भर का गम था , पर उसे रोना नहीं आया |
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बढिया ग़ज़लें हैं

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

इस मजमुए के लिए बहुत बहुत बधाई …और बहुत उम्दा गज़लें हैं साहब ...एकदम तजुर्बे से पगी हुयी

"अर्श" ने कहा…

आपके इस पहले मजमुए के लिए बहुत बधाई साब !सारी ग़ज़लें कमाल की हैं !

अर्श

"अर्श" ने कहा…

आपके इस पहले मजमुए के लिए बहुत बधाई साब !सारी ग़ज़लें कमाल की हैं !

अर्श

vandana gupta ने कहा…

अपने स्कूलों से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ! यही आनन्द की खासियत है सादगी से गहरी बात कह जाते हैं …………आनन्द को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आनंद जी को बहुत बहुत बधाई इस संग्रह पे ...
उनकी गज़लों का आनद तो लेते हैं ... उनकी सहज भाषा ... कहाँ का अंदाज़ सीधे दिल में उतर जाता है ... बधाई और शुभकामनाएं हैं उन्हें ...

रामजी तिवारी ने कहा…

बहुत बधाई और शुभकामनाये ....लेकिन इतने से जी नहीं भरा ...किताब कैसे मिलेगी , यह भी बताईये |

dinesh tripathi ने कहा…

आनंद भाई की गज़लें दमदार और सलाहियत से भरपूर हैं . उनके इस पहले संग्रह के लिए उन्हें दिली मुबारकबाद .

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बधाई इस शानदार गज़ल संग्रह के लिये ।

Rajeev Ranjan ने कहा…


खुदा को भी बहुत ऐतराज़, है मेरे उसूलों पर, वो जैसा चाहता है मुझसे वो होना नहीं आया |
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सख्त असमंजश में हूँ बच्चों को क्या तालीम दूँ , साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !
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मेरी हर मज़बूरी को तू मेरी मनमानी लिख
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तालीम हमने पैसे कमाने की दी उन्हें नाहक नयी पीढ़ी में ग़दर ढूंढ रहा हूँ
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आप बहुत कुछ सीख कर बड़े हुए हैं। आपके सीखे से हमारे बड़े होने में कितनी ‘(अ)सुविधा’ होगी....यह भी देखा जाए। खैर! आप ही के शब्दों में-'मैं अक्सर खिलखिलाता हूँ, मगर ये रंज अब भी है, मुझे 'आनंद' होना था ...मगर होना नहीं आया।'
साधुवाद! आपकों।

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

बी एस पाबला ने कहा…

बहुत बहुत बधाई

gumnaam ने कहा…

सुन्दर रचना सारी ग़ज़लें कमाल की हैं !
पहले संग्रह के लिए दिली मुबारकबाद .

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